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“खुद से मुलाक़ात”

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  “खुद से मुलाक़ात” कुछ उलझी हुई, कुछ सुलझी हुई, मैं प्रश्न बनी, मैं ही उत्तर हूँ, बाहरी जग में जितना खोजा, उतना ही भीतर से बिखरती हूँ। आईनों में चेहरा दिखा हर बार, पर “मैं” का दर्शन हो न सका, जो दिखता था वो आवरण था, अंतर का सत्य छू न सका। दुनिया के स्वर, जग के बंधन, मुझमें ही आकर बसते रहे, मैं मौन रही, मैं शून्य बनी, अपने ही भीतर धँसते रहे। फिर एक क्षण ऐसा भी आया— जब सब कुछ जैसे थम-सा गया, न कोई बाहर, न कोई भीतर, बस “मैं” का साक्षी जग-सा गया। मैं निकली फिर उस पथ पर, जहाँ न दिशा, न कोई छोर, बस श्वासों की धीमी गति में, खुद का स्पंदन, खुद का शोर। परत-दर-परत हटाती गई मैं, हर झूठा नाम, हर एक रूप, जो बचा अंत में, वही सत्य था— निर्विकार, निःशब्द, अनूप। वो “मैं” न तन, न मन की सीमा, न समय, न कोई पहचान, वो शुद्ध चैतन्य, शांत अग्नि-सा, जिसमें लय हो हर अज्ञान। अब न कोई खोज, न दूरी शेष, न पाने की कोई प्यास रही, मैं ही साधक, मैं ही साध्य, मैं ही राह, मैं ही आस रही। और जब मिलन हुआ खुद से, तो जाना—मैं कहीं गई ही न थी, जिसे ढूंढती रही जग में, वो “मैं” तो सदा यही...

नारी — एक नई सुबह

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 शीर्षक: नारी — एक नई सुबह नारी केवल एक शब्द नहीं, वह जीवन की एक धारा है। शांत भी, गहरी भी, और अनंत तक बहने वाली भी। उसकी आँखों में सपनों का आकाश है, और मन में अडिग विश्वास है। वह जहाँ खड़ी हो जाती है, वहीं से एक नया इतिहास है। वह चुप भी रहती है तो समय को बहुत कुछ सिखा जाती है, और जब मुस्कुरा देती है तो थकी हुई दुनिया में आशा जगा जाती है। वह संघर्ष भी है, और सृजन भी। वह कोमल भी है, और अटूट साहस का दर्पण भी। कभी वह धूप बनकर अंधेरों को रास्ता दिखाती है, कभी चाँदनी बनकर थके दिलों को सुकून दिलाती है। उसके कदम जहाँ पड़ते हैं, वहाँ विश्वास जन्म लेता है। उसकी एक छोटी सी मुस्कान से जीवन फिर से खिल उठता है। उसके भीतर एक उजाला है जो कभी बुझता नहीं, वह जहाँ जाती है वहाँ जीवन ठहरता नहीं। आज का दिन केवल एक दिन नहीं, यह उसकी गरिमा का सम्मान है। हर स्त्री के मन की गहराई में एक अद्भुत, अनंत आसमान है। यह कविता समर्पित है हर उस स्त्री को जो अपनी शांति, अपने साहस और अपनी मुस्कान से दुनिया को थोड़ा और सुंदर बना देती है। Happy Women’s Day – Her Voice के साथ हर नारी को सलाम।

​"ममत्व की ढाल"

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 दुनिया देखती है बस चेहरा तुम्हारा, वो धीरज, वो साहस, वो मुस्कान प्यारी। सबके सवालों का बस एक ही उत्तर, तुम घर की छत भी, तुम ही हो सवारी। थक कर जो टूटे, वो हिम्मत नहीं तुम, जो आँसू बहा दे, वो फुर्सत नहीं तुम। नन्हे से चेहरों की खातिर सँभलना, तुम्हारी ज़रूरत, शिकायत नहीं तुम। मौन का बोझ सीने में अपने एक कोना रखा है, जहाँ यादों का भारी बिछौना रखा है। वो आँसू जो पलकों तक आकर हैं लौटे, उन्हें कल की खातिर पिरोना रखा है। तुम चाहती हो कि बस चीख मारो, थक कर इस दुनिया से खुद को पुकारो। पर जूतों के फीते अभी बाँधने हैं, तुम कैसे ये हिम्मत अभी हार जाओ? कोमलता में छिपी शक्ति मुस्कुराकर पहाड़ों को ढोना भी तुम हो, अंधेरी रातों में एक कोना भी तुम हो। सब कहते हैं तुम फौलाद जैसी बनी हो, पर खुदा जानता है कि 'माँ' ही तो तुम हो। अकेली नहीं हो, तुम खुद में फौज हो, हर मुश्किल का अपनी, तुम ही तो मौज हो। गर आँखें भर आएँ, तो डरना नहीं तुम, तुम अपनी कहानी की असली ओज हो। ​जब थक कर ये दुनिया सो जाती है, तुम्हारी थकान और गहरी हो जाती है। कोई हाथ नहीं जो कंधे को थामे, कोई लफ्ज़ नहीं जो तुम्हें "बस" कह...

आज मेरा पुनर्जन्म है

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आज मेरा पुनर्जन्म है आज मेरा पुनर्जन्म है, टूटी हुई ख़ामोशियों से बाहर आने का दिन, जो कल तक डर थी मेरी परछाईं, आज वही मेरी शक्ति बन जाने का दिन। आज मेरा पुनर्जन्म है, हर उस ज़ंजीर को तोड़ने का साहस, जो समाज ने नहीं, मैंने ख़ुद अपने मन में बाँध रखी थी। आज मेरा पुनर्जन्म है, आँसू नहीं—अनुभव साथ है, हार नहीं—सीख का उजाला है, बीता कल अब बोझ नहीं, बल्कि आगे बढ़ने का सहारा है। आज मेरा पुनर्जन्म है, मैं फिर से ख़ुद को चुन रही हूँ, दुनिया की उम्मीदों से पहले अपनी साँसों को सुन रही हूँ। आज मेरा पुनर्जन्म है, अब मैं माफ़ी नहीं माँगूँगी अपने सपनों के लिए, अब मैं झुकूँगी नहीं अपनी पहचान छुपाने के लिए। आज मेरा पुनर्जन्म है, कमज़ोर नहीं, जागरूक होकर जन्म लिया है, डरी हुई नहीं, बल्कि विश्वास से भरी होकर जीना सीखा है। हाँ, आज मेरा पुनर्जन्म है— नाम वही है, पर आत्मा नई है, और ये नई मैं अब रुकने वाली नहीं है। ✨

औरत को क्या चाहिए ?

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औरत को क्या चाहिए  ? सबकी मन की उलझन यही, औरत को आखिर क्या चाहिए? ना ताज, ना तख़्त, ना सोने की चाह, बस सम्मान से जीने का हक चाहिए। एक नारी को उसकी गरिमा चाहिए, जो उसके साँसों में बसी पहचान हो, ना नाम से पहले रिश्ते जुड़ें, पहले वो खुद एक इंसान हो। जैसा हक़ जीने का नर को है, वैसा ही अधिकार नारी को चाहिए, अपने फैसलों, अपने सपनों में, उसको भी खुला आसमान चाहिए। ना हर बार त्याग की मूरत बने, ना चुप रहने की सीख दी जाए, वो बोले तो आवाज़ कहलाए, ना हर बात पर शर्म सिखाई जाए। घर की दीवारें उसकी सीमा नहीं, दुनिया भी उसकी अपनी हो, वो माँ भी बने, वो बेटी भी, पर पहले वो खुद की कहानी हो। ना दया, ना एहसान, ना उपकार, बस बराबरी का व्यवहार चाहिए, ना कमज़ोर, ना अबला समझी जाए, उसे भी खुद पर विश्वास चाहिए। जब वो गिरे तो सहारा मिले, जब उठे तो तालियाँ बजे, औरत को बस इतना चाहिए— हर मोड़ पर उसका हक सजे। सबकी मन की उलझन सुलझे तब, जब समाज ये बात समझ पाए, औरत को कुछ ज़्यादा नहीं चाहिए— बस इंसान की तरह जीना आए।

मन की उलझन

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  मन की उलझ मन की उलझन, अनकहे से सवाल, खामोशी में छुपे हैं हज़ारों ख्याल। हँसी ओढ़े चेहरे, आँखों में नमी, भीड़ के बीच भी लगती है तन्हाई सी कभी। कभी सपने बुलाएँ, कभी डर रोक लें, कदम बढ़ें तो सही, पर राहें टोक लें। अपने ही फैसलों से लड़ता है मन, चाहे सुकून का घर, पर भटकता है हर क्षण। कभी बीते लम्हों की परछाईं सताए, कभी आने वाला कल बेचैन बनाए। ना पूरा अतीत छूट पाता है कहीं, ना भविष्य की तस्वीर साफ़ दिखती सही। मन की उलझन में भी छुपा है इक रास्ता, हर गाँठ के भीतर है साहस का वास्ता। थोड़ा ठहरो, खुद से बातें तो करो, इन उलझी लकीरों को धीरे-धीरे सुलझा लो । क्योंकि जो मन को समझ ले, वही जीत जाता है, हर उलझन के बाद नया सवेरा मुस्काता है। मन की उलझन ही बनती है पहचान, यहीं से शुरू होती है खुद से मिलने की उड़ान। 

​नया अस्तित्व

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​ खुद की ही परछाईं से, अब तक मैं अनजान रही, दबी रही जो भीतर कहीं, उस नारी से बेज़ुबान रही। दूसरों की नज़रों में खुद का अक्स तलाशती थी, मैं अपनी ही ताकत से, अब तक तो अनजान रही। ​पर अब पिघल गई हैं जंजीरें, जो सोच पर मेरी छाई थीं, वो सब बातें पीछे छूटीं, जो दुनिया ने सिखाई थीं। अब खुद के पास आ गई हूँ, खुद को मैं पहचान गई हूँ , पुराने सब लिबाज़ों को, अब मैं उतार आई हूँ । ​मैं वो स्त्री नहीं, जो कल तक सहमी-सहमी थी,  मैं वो नारी नहीं, जिसकी दुनिया बस वहमी थी। मैं अब अपनी धुन की लहर हूँ, खुद ही अपना किनारा हूँ, भटके हुए उस राही का, मैं चमकता हुआ सितारा हूँ। ​अपनी हिम्मत, अपनी मेहनत से, एक नया इतिहास सजाती हूँ, मैं  किसी और की छाया नहीं, खुद की पहचान बनाती हूँ।