औरत को क्या चाहिए ?
औरत को क्या चाहिए ?
सबकी मन की उलझन यही,
औरत को आखिर क्या चाहिए?
ना ताज, ना तख़्त, ना सोने की चाह,
बस सम्मान से जीने का हक चाहिए।
एक नारी को उसकी गरिमा चाहिए,
जो उसके साँसों में बसी पहचान हो,
ना नाम से पहले रिश्ते जुड़ें,
पहले वो खुद एक इंसान हो।
जैसा हक़ जीने का नर को है,
वैसा ही अधिकार नारी को चाहिए,
अपने फैसलों, अपने सपनों में,
उसको भी खुला आसमान चाहिए।
ना हर बार त्याग की मूरत बने,
ना चुप रहने की सीख दी जाए,
वो बोले तो आवाज़ कहलाए,
ना हर बात पर शर्म सिखाई जाए।
घर की दीवारें उसकी सीमा नहीं,
दुनिया भी उसकी अपनी हो,
वो माँ भी बने, वो बेटी भी,
पर पहले वो खुद की कहानी हो।
ना दया, ना एहसान, ना उपकार,
बस बराबरी का व्यवहार चाहिए,
ना कमज़ोर, ना अबला समझी जाए,
उसे भी खुद पर विश्वास चाहिए।
जब वो गिरे तो सहारा मिले,
जब उठे तो तालियाँ बजे,
औरत को बस इतना चाहिए—
हर मोड़ पर उसका हक सजे।
सबकी मन की उलझन सुलझे तब,
जब समाज ये बात समझ पाए,
औरत को कुछ ज़्यादा नहीं चाहिए—
बस इंसान की तरह जीना आए।
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