​"ममत्व की ढाल"


 दुनिया देखती है बस चेहरा तुम्हारा,

वो धीरज, वो साहस, वो मुस्कान प्यारी।

सबके सवालों का बस एक ही उत्तर,

तुम घर की छत भी, तुम ही हो सवारी।


थक कर जो टूटे, वो हिम्मत नहीं तुम,

जो आँसू बहा दे, वो फुर्सत नहीं तुम।

नन्हे से चेहरों की खातिर सँभलना,

तुम्हारी ज़रूरत, शिकायत नहीं तुम।


मौन का बोझ

सीने में अपने एक कोना रखा है,

जहाँ यादों का भारी बिछौना रखा है।

वो आँसू जो पलकों तक आकर हैं लौटे,

उन्हें कल की खातिर पिरोना रखा है।

तुम चाहती हो कि बस चीख मारो,

थक कर इस दुनिया से खुद को पुकारो।

पर जूतों के फीते अभी बाँधने हैं,

तुम कैसे ये हिम्मत अभी हार जाओ?


कोमलता में छिपी शक्ति

मुस्कुराकर पहाड़ों को ढोना भी तुम हो,

अंधेरी रातों में एक कोना भी तुम हो।

सब कहते हैं तुम फौलाद जैसी बनी हो,

पर खुदा जानता है कि 'माँ' ही तो तुम हो।

अकेली नहीं हो, तुम खुद में फौज हो,

हर मुश्किल का अपनी, तुम ही तो मौज हो।

गर आँखें भर आएँ, तो डरना नहीं तुम,

तुम अपनी कहानी की असली ओज हो।


​जब थक कर ये दुनिया सो जाती है,

तुम्हारी थकान और गहरी हो जाती है।

कोई हाथ नहीं जो कंधे को थामे,

कोई लफ्ज़ नहीं जो तुम्हें "बस" कह पुकारे।

​तन्हाई की चादर तुम ओढ़ तो लेती हो,

पर अपनी ही सिसकी को तुम मोड़ देती हो।

कि कहीं जाग न जाए वो मासूम सा सोता,

जो तुम्हारी हँसी को ही सच मानकर है जीता।


​कांच सी चमक, पत्थर सी जान

​आईने में जब तुम खुद को निहारती हो,

तो सुलझने से ज़्यादा खुद को संवारती हो।

काजल की रेख में वो नमी छिपाना,

कितना कठिन है ये 'सब ठीक है' जताना।

​तुमने भुला दिया कि तुम भी तो नाज़ुक थी,

कभी तुम भी अपनों की लाडली, मासूम थी।

पर अब तुम ही दीवार हो, तुम ही साया हो,

तुमने खुद को जलाकर ये घर बनाया है।


​अनकहा बलिदान

​तुम्हारी खामोशी में एक शोर छिपा है,

तुम्हारे सबर में एक दौर छिपा है।

जो आँसू नहीं गिरे, वो मोती बन गए,

तुम्हारे बच्चों के रस्ते की ज्योति बन गए।

​तुम कमजोर नहीं, तुम तो आधार हो,

बिना माँगे जो मिले, वो निस्वार्थ प्यार हो।

रो लेना कभी, जब चाँद साथ हो तुम्हारे,

पर याद रखना, तुम खुद आफताब (सूरज) हो हमारे।

​ये कविता आपकी उस शक्ति को सलाम करती है जिसे दुनिया अक्सर देख नहीं पाती। आप वाकई एक योद्धा हैं।

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