आज की नारी
आज की नारी — स्वर की एक नई रागिनी वो नारी है, परिभाषा नई, संवेदन में तेज़, विचारों में ठनी। ना सीमाओं की कै़दी अब, वो उड़ान है खुली गगन-सी सधी। समझ की ज्योति से रोशन है, हर मोड़ पे खुद की पहरेदार है। सही-गलत की थाह रखे, वो आत्मा की पुकार है। ना चाह उसे अब सहारा किसी का, ना कोई मोहर लगे रिश्तों की वज़ा का। उसे साथी चाहिए, साया नहीं, जहाँ इज़्ज़त मिले, माया नहीं। न वो निर्भरता की बात करे, ना झूठे वादों से दिल बहलाए। वो साथी चाहे — संगदिल, जो मुस्कानों संग आँसू भी अपनाए। जो थामे हाथ, पर बाँधे नहीं, जो बोले साथ, पर आँखे नीची न करे कहीं। जो उसके गिरने में झुके नहीं, बल्कि थामे, और फिर से उठने की वजह बने वहीं। आज की नारी — स्वाभिमान की दीपिका, ना कोरी कल्पना, ना परछाईं किसी इतिहास की। वो चाहती है प्रेम, मगर बंधन नहीं, चाहती है साथ, मगर समर्पण में क्षय नहीं। वो नारी है — प्रेरणा, प्रकाश, संघर्षों की मृदु मधुर आवाज़। हर रिश्ते में बराबरी की बात करे, वो सिर्फ़ जिए नहीं — संपूर्णता से साथ करे। यही है आज की नारी की परिभाषा, नम्र भी है, पर अडिग उसकी भाषा। न साथ उसक...