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Showing posts from May, 2025

आज की नारी

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आज की नारी  — स्वर की एक नई रागिनी वो नारी है, परिभाषा नई, संवेदन में तेज़, विचारों में ठनी। ना सीमाओं की कै़दी अब, वो उड़ान है खुली गगन-सी सधी। समझ की ज्योति से रोशन है, हर मोड़ पे खुद की पहरेदार है। सही-गलत की थाह रखे, वो आत्मा की पुकार है। ना चाह उसे अब सहारा किसी का, ना कोई मोहर लगे रिश्तों की वज़ा का। उसे साथी चाहिए, साया नहीं, जहाँ इज़्ज़त मिले, माया नहीं। न वो निर्भरता की बात करे, ना झूठे वादों से दिल बहलाए। वो साथी चाहे — संगदिल, जो मुस्कानों संग आँसू भी अपनाए। जो थामे हाथ, पर बाँधे नहीं, जो बोले साथ, पर आँखे नीची न करे कहीं। जो उसके गिरने में झुके नहीं, बल्कि थामे, और फिर से उठने की वजह बने वहीं। आज की नारी — स्वाभिमान की दीपिका, ना कोरी कल्पना, ना परछाईं किसी इतिहास की। वो चाहती है प्रेम, मगर बंधन नहीं, चाहती है साथ, मगर समर्पण में क्षय नहीं। वो नारी है — प्रेरणा, प्रकाश, संघर्षों की मृदु मधुर आवाज़। हर रिश्ते में बराबरी की बात करे, वो सिर्फ़ जिए नहीं — संपूर्णता से साथ करे। यही है आज की नारी की परिभाषा, नम्र भी है, पर अडिग उसकी भाषा। न साथ उसक...

आशा : जीवन की राह

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आशा  जब जीवन थमे साँसों की तरह, और चारों ओर छाए मौन प्रहर। जब उम्मीदें भी लगें थकी-हारी, और राहें हों पीड़ा की सवारी। जब शब्दों का भी साथ छूट जाए, और मन बस मौन में डूब जाए। तब जो अंतर में धीरे मुस्काए, वो आशा ही तो दीपक बन जाए। जो अश्रु को भी मोती में बदले, जो टूटे पलों में सपने गढ़े। जो वीराने में मधुर राग छेड़े, सूनी राहों में फिर रंग भरे। वो जो अधूरे स्वप्न समेटे, हर हार को नई दृष्टि से देखे। जो कहे – ‘अभी अंत नहीं हुआ’, हर गिरते क़दम को सहारा दे। जो अंधकार को भी समझाए बाती, और सन्नाटे में बो दे साज की थाती। जो पतझड़ में भी वसंत रचाए, हर पत्थर को मंदिर बनाए। हर छिन में जो उम्मीद का संचार करे, हर थमे पल में फिर से संसार भरे। जो टूटे दिलों में साहस की लौ जगाए, जो कहे – ‘तू फिर से उड़ पाए’। आशा – वो मौन शक्ति, वो छुपी आवाज़, जो हर अंत में रचती है एक नई शुरुआत। वो नन्हा दीप जो आँधियों में भी मुस्काए, हर दिल की अंतिम पर, पहली आस कहलाए।