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हिम्मत कर ले आज तू, तो जंग जीत जाएगी

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हिम्मत कर ले आज तू, तो जंग जीत जाएगी अपनी ख़ुशियों की ख़ातिर, किसको दोष ठहराएगी? हिम्मत कर ले आज तू, तो जंग जीत जाएगी, हर आँधी से टकरा के, खुद को सींच पाएगी। अभी तो बस शुरुआत है, मंज़िल बहुत दूर नहीं, तेरे क़दमों की आवाज़ से, अब खामोशी भी चीर जाएगी। अपनी ख़ुशियों की ख़ातिर, किसको दोष ठहराएगी? कभी हालात, कभी रिश्ता, क्या खुद को ना आजमाएगी? जो टूटा था, वो सपना फिर से जोड़े हाथों से, आशाएँ खुद लिख डालेगी, ना तक़दीर से डर पाएगी। तेरे आंसू भी तेरी ताक़त हैं, याद रख ये बात, हर दर्द से तू निकलेगी, बनकर खुद की सौगात। ज़िम्मेदारियाँ हैं बहुत, पर ज़रा खुद को भी समझ, तू भी कोई रिश्ता है, बस औरों का नाम नहीं। जो बीत गया, वो वक्त था, अब तू वक्त बन जाएगी, हिम्मत कर ले आज तू, तो जंग जीत जाएगी। अपनी ख़ुशियों की ख़ातिर, बहानों में क्या रखा है? अब खुद को थाम ले तू, ये सफ़र तेरा ही लिखा है। हिम्मत कर ले आज तू, तो जंग जीत जाएगी अपनी ख़ुशियों की ख़ातिर, किसको दोष ठहराएगी?

"प्रेम: एक बौद्धिक संवाद"

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  शीर्षक: "प्रेम: एक बौद्धिक संवाद" प्रेम क्या है? केवल स्पर्श का नाम नहीं, यह तो आत्मा की भाषा है, कोई जाम नहीं। ना वह आँखों की नमी में सिमटता है, ना ही वचनबद्ध वादों में बँधता है। यह तर्क से टकराता है, फिर भी जीतता है, मन की गणनाओं में भी यह संगीत सा रीझता है। यह कोई संयोग नहीं, चेतना की पुकार है, एक आत्मा दूसरी को जब पहचान ले, वही सार है। यह केवल हृदय की थरथराहट नहीं, यह बुद्धि की प्रश्नावली में भी एक स्पष्ट हाँ है कहीं। जहाँ सोच और भावना का संतुलन होता है, वहीं प्रेम अपनी परिभाषा में खड़ा होता है। यह क्रांति भी है - चुप सी, मगर साहसी, जो रूढ़ियों से टकरा जाए, वो प्रेम सच्चा और स्पष्टावासी। यह स्त्री के जीवन में कोई दया नहीं, बल्कि उसकी शक्ति का, उसकी चेतना का गान है वहीं। कभी वह कबीर की उलझी उलटबांसियाँ है, तो कभी मीरा की सरल मगर अथाह भक्ति-भावनाएँ हैं। वह तर्क की कसौटी पर भी खरा उतरता है, जब कोई स्त्री अपने आप को प्रेम करती है — तब समझ आता है। प्रेम वह है जो "स्वयं" से शुरू होकर "साथ" तक पहुँचता है, जहाँ अधूरी नहीं, पूरी स्त्री ख...