Posts

Showing posts from April, 2025

दुविधा

Image
दुविधा – अपने मन की सुनूँ या समाज की व्यवस्था? (एक स्त्री की सोच में गूंजता सवाल) चलती हूँ रोज़ उस राह पर, जो वर्षों से बिछाई गई है, जहाँ हर मोड़ पे लिखी हैं लकीरें, जैसे किस्मत भी समाज ने बनाई है। मन कहे—"उड़ चल, तोड़ दे बंधन, जो तेरे पंखों को रोके", पर समाज कहे—"मर्यादा रख, ये उड़ान नहीं, भ्रम के धोखे।" कभी चाहा किताबों में डूब जाना, कभी मंचों पर बोल पड़ना, पर कहा गया—"घर की लक्ष्मी बन, ये बाहर की बातें छोड़ देना।" मन के कोने में पलती है ख्वाहिश, कि खुद को खुद में पाऊँ, पर हर आवाज़ कहती है— "पहले सबकी सोच में समाऊँ।" कभी माँ की ममता बनकर झुकी, कभी बहू की गरिमा में सिमटी, कभी अपने सपनों से मुँह मोड़ा, क्योंकि समाज की रीत न टूटी। पर अब पूछती हूँ खुद से, कब तक यही दोहराया जाएगा? कब अपने मन की बात, बिना डर के कहा जाएगा? क्या सही है, क्या ग़लत, ये मैं तय कर सकती हूँ, सुनूंगी अब अपने भीतर की आवाज़, जो सच की परिभाषा लिखती है। व्यवस्था तब सुंदर है, जब वो इंसानियत से जुड़ी हो, पर जो मन को कैद करे, वो सिर्फ़ एक रस्म अधूरी ...

मुक्ति

Image
  मुक्ति  :  मन का भाव बंधन टूटें, मन उड़ चले, जैसे पंख हों खुले गगन तले। ना डर हो, ना चाह कोई, बस शांति की लहर, और राह नई। संघर्षों की धूप में जो जले, वही जानते हैं छाँव के पल। मुक्ति कोई मंज़िल नहीं, एक अनुभव है, आत्मा का हल। त्याग की अग्नि में तप कर, अहम् को राख बनाना पड़ता है। सच के दर्पण में झाँक कर, स्व को पहचानना पड़ता है। माया के मेले में उलझे हैं सब, हर कोई खोजे अपने ही स्वरूप। कोई धन में, कोई यश में, पर मुक्ति मिले जब टूटे झूठ का रूप। न सागर की गहराई में, न पर्वत की ऊँचाई में। वह तो है अंतर की एक थाह, जहाँ ना शब्द हों, ना कोई राह। मुक्ति है जब क्रोध पिघले प्रेम में, जब द्वेष बदल जाए क्षमा के क्षेम में। जब हृदय हो विशाल जैसे आकाश, और जीवन हो सरल, निर्मल प्रकाश। नहीं बंधनों से भाग जाना, बल्कि बंधनों में रह कर मुस्कुराना। मुक्ति है भीतर की वह लौ, जो अंधेरों में भी जलती रहे खोखले भयों को धो। साँसों की सरगम में छुपा राग है, हर धड़कन में एक अनुराग है। मुक्ति है प्रेम, मुक्ति है त्याग, मुक्ति है आत्मा का अनुराग। जब न हो कोई प्रश्न शेष, ...