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Showing posts from March, 2025

स्त्री का सफ़र : जीवन का संघर्ष

  स्त्री का सफ़र जनम लिया तो जश्न नहीं था, बस एक आहट सी आई, माँ की आँखों में डर था, पिता की पलकों में परछाई। गोदी में आई तो बोझ कहलाई, बचपन में ही सपनों की चिता जलाई। गुड़ियों से खेलने की चाह थी, पर हाथों में झाड़ू थमा दिया, स्कूल का दरवाज़ा देखा ही नहीं, चौका-बर्तन सिखा दिया। भाई को मिले परवाज़ के पंख, और मुझको मिल गईं बेड़ियाँ संग। यौवन आया तो पर्दे में छुपा दिया, अपनी ही हँसी को ग़लत बता दिया। दहलीज़ लांघी तो बदचलन कही गई, चुप रही तो कमज़ोर समझी गई। ब्याह हुआ तो नए बंधन मिले, अपनों के बीच भी अनजाने ग़म मिले। पति का ग़ुस्सा, सास की फटकार, हर दर्द पे चुप रहना ही था मेरा अधिकार। माँ बनी तो कलेजा चौड़ा हुआ, पर बेटी हुई तो घर का चेहरा कड़ा हुआ। सोचा था मेरी बच्ची उड़ सकेगी, पर उसकी भी तक़दीर मुझ-सी लिखी गई। रातें कटीं आँसुओं में भीगी, ख़ुद को समेटा, पर दुनिया ने छीनी हर सीढ़ी। चीख़ उठी जब, तो आवाज़ दबा दी, सपनों की अर्थी खुद अपने कंधों पर उठा ली। बूढ़ी हुई तो बस बोझ बनी, जिन्हें पाल-पोस कर बड़ा किया, आज उनकी आँखों में चुभती रही। आख़िर में चिता की आग ही साथ...

"ख़ुशी मेरे ही अंदर है"

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  "ख़ुशी मेरे ही अंदर है" क्यों आज भी ख़ुशी की तलाश है? जब वो तो मेरे ही पास है, क्यों भाग रही हूँ अनजानी राहों पर? जब मेरा ही मन एक उजली आस है, बाहर भटकती नज़रों से, दिल की गहराइयों को क्यों ना देखूँ मैं? जहाँ हर धड़कन गा रही है गीत, फिर क्यों ख़ामोश रहूँ मैं? ख़ुशी का पीछा या उसका एहसास? सपनों के पीछे भाग रही हूँ, पर सुकून तो मेरे क़दमों में है, जो पाने की चाह में खो गया, वो शायद मेरे मन में है। हर मंज़िल पर रुककर देखा, पर अधूरा सा कुछ हर बार लगा, आकाश छूने की चाह में, ज़मीन का सौंधापन छूट गया। बचपन की हंसी और आज की उलझन कभी हँसी थी खिलखिलाती, बेवजह भी मुस्कुराती, अब क्यों चेहरे पे शिकन है? जब ख़ुशी मेरी अपनी धड़कन है, वो बेपरवाह दिन, वो नटखट पल, कहाँ खो गए समय के साथ? अब मुस्कुराने के भी कारण खोजती हूँ, क्या भूल गई वो मासूम सी बात? खुद से सवाल आईना जब भी देखती हूँ, एक सवाल सा खड़ा मिलता है, क्यों खोज रही हूँ रौशनी को? जब सूरज मुझमें ही जलता है क्यों मांगती हूँ औरों से रोशनी? जब खुद का उजाला कम नहीं क्यों ढूँढती हूँ सहारा किसी का? जब खुद का...

मैं खुश हूँ:कविता

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मैं खुश हूँ  सुबह की पहली किरण के साथ, जब नींद अभी अधूरी थी, मैं जाग गई, घर जागा नहीं, सपनों की चाय फिर ठंडी पड़ी। चूल्हा पहले जला, फिर उम्मीदें, पर मैं नहीं जली, मैं खुश हूँ। बचपन में गुड्डे-गुड़ियों के खेल, पर दुनिया ने सिखाया सब्र का मेल। "लड़कियाँ धीरे बोलती हैं", "अच्छे घर की बेटियाँ कम हँसती हैं।" पर मैंने हँसी नहीं रोकी, अब भी गूँजती हूँ, मैं खुश हूँ। कभी किताबों में डूबी, कभी रसोई में खोई, कभी सपनों के पंख लगे, कभी परवाह में रोई। पढ़ने निकली थी आकाश छूने, पर सीली आँखों से विदाई हुई, बाबुल का घर छूटा, पर खुद को नहीं छोड़ा, अब भी चल रही हूँ, मैं खुश हूँ। ब्याह के बाद घर मिला, पर कमरा नहीं, रिश्ते मिले, पर जगह नहीं। कभी ‘बहू’, कभी ‘माँ’, कभी ‘पत्नी’ बन गई, पर मैं? मैं कहाँ रह गई? खुद की तलाश में उलझी, अब भी ढूंढ रही हूँ, मैं खुश हूँ। तन की साड़ी में लिपटे मन के सवाल, क्या मैं बस ये ही हूँ? रात के खाने से सुबह की धूप तक, सपनों से हकीकत के टूट तक, सबका ख्याल रखा, पर खुद को ही भूली, फिर भी हँस रही हूँ, मैं खुश हूँ। रोज़ की भाग-दौड़, र...