"ख़ुशी मेरे ही अंदर है"
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"ख़ुशी मेरे ही अंदर है"
क्यों आज भी ख़ुशी की तलाश है?
जब वो तो मेरे ही पास है,
क्यों भाग रही हूँ अनजानी राहों पर?
जब मेरा ही मन एक उजली आस है,
बाहर भटकती नज़रों से,
दिल की गहराइयों को क्यों ना देखूँ मैं?
जहाँ हर धड़कन गा रही है गीत,
फिर क्यों ख़ामोश रहूँ मैं?
ख़ुशी का पीछा या उसका एहसास?
सपनों के पीछे भाग रही हूँ,
पर सुकून तो मेरे क़दमों में है,
जो पाने की चाह में खो गया,
वो शायद मेरे मन में है।
हर मंज़िल पर रुककर देखा,
पर अधूरा सा कुछ हर बार लगा,
आकाश छूने की चाह में,
ज़मीन का सौंधापन छूट गया।
बचपन की हंसी और आज की उलझन
कभी हँसी थी खिलखिलाती,
बेवजह भी मुस्कुराती,
अब क्यों चेहरे पे शिकन है?
जब ख़ुशी मेरी अपनी धड़कन है,
वो बेपरवाह दिन, वो नटखट पल,
कहाँ खो गए समय के साथ?
अब मुस्कुराने के भी कारण खोजती हूँ,
क्या भूल गई वो मासूम सी बात?
खुद से सवाल
आईना जब भी देखती हूँ,
एक सवाल सा खड़ा मिलता है,
क्यों खोज रही हूँ रौशनी को?
जब सूरज मुझमें ही जलता है
क्यों मांगती हूँ औरों से रोशनी?
जब खुद का उजाला कम नहीं
क्यों ढूँढती हूँ सहारा किसी का?
जब खुद का होना किसी से कम नहीं,
अब खुद को अपनाना है
अब नहीं भटकूँगी दर-ब-दर,
ना खुशियों के दरवाज़े खटखटाऊँगी,
जो खोज रही थी बाहर मैं,
अब उसे भीतर ही पाऊँगी।
हर लम्हा अनमोल है मेरा,
हर सांस में बसी है एक नयी रोशनी,
अब नहीं भटकूंगी इस दुनिया में,
अब पहचानूंगी अपनी सच्ची ख़ुशी।
✨ ख़ुशी बाहर नहीं, मेरे ही अंदर है! ✨
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