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आज मेरा पुनर्जन्म है

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आज मेरा पुनर्जन्म है आज मेरा पुनर्जन्म है, टूटी हुई ख़ामोशियों से बाहर आने का दिन, जो कल तक डर थी मेरी परछाईं, आज वही मेरी शक्ति बन जाने का दिन। आज मेरा पुनर्जन्म है, हर उस ज़ंजीर को तोड़ने का साहस, जो समाज ने नहीं, मैंने ख़ुद अपने मन में बाँध रखी थी। आज मेरा पुनर्जन्म है, आँसू नहीं—अनुभव साथ है, हार नहीं—सीख का उजाला है, बीता कल अब बोझ नहीं, बल्कि आगे बढ़ने का सहारा है। आज मेरा पुनर्जन्म है, मैं फिर से ख़ुद को चुन रही हूँ, दुनिया की उम्मीदों से पहले अपनी साँसों को सुन रही हूँ। आज मेरा पुनर्जन्म है, अब मैं माफ़ी नहीं माँगूँगी अपने सपनों के लिए, अब मैं झुकूँगी नहीं अपनी पहचान छुपाने के लिए। आज मेरा पुनर्जन्म है, कमज़ोर नहीं, जागरूक होकर जन्म लिया है, डरी हुई नहीं, बल्कि विश्वास से भरी होकर जीना सीखा है। हाँ, आज मेरा पुनर्जन्म है— नाम वही है, पर आत्मा नई है, और ये नई मैं अब रुकने वाली नहीं है। ✨

औरत को क्या चाहिए ?

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औरत को क्या चाहिए  ? सबकी मन की उलझन यही, औरत को आखिर क्या चाहिए? ना ताज, ना तख़्त, ना सोने की चाह, बस सम्मान से जीने का हक चाहिए। एक नारी को उसकी गरिमा चाहिए, जो उसके साँसों में बसी पहचान हो, ना नाम से पहले रिश्ते जुड़ें, पहले वो खुद एक इंसान हो। जैसा हक़ जीने का नर को है, वैसा ही अधिकार नारी को चाहिए, अपने फैसलों, अपने सपनों में, उसको भी खुला आसमान चाहिए। ना हर बार त्याग की मूरत बने, ना चुप रहने की सीख दी जाए, वो बोले तो आवाज़ कहलाए, ना हर बात पर शर्म सिखाई जाए। घर की दीवारें उसकी सीमा नहीं, दुनिया भी उसकी अपनी हो, वो माँ भी बने, वो बेटी भी, पर पहले वो खुद की कहानी हो। ना दया, ना एहसान, ना उपकार, बस बराबरी का व्यवहार चाहिए, ना कमज़ोर, ना अबला समझी जाए, उसे भी खुद पर विश्वास चाहिए। जब वो गिरे तो सहारा मिले, जब उठे तो तालियाँ बजे, औरत को बस इतना चाहिए— हर मोड़ पर उसका हक सजे। सबकी मन की उलझन सुलझे तब, जब समाज ये बात समझ पाए, औरत को कुछ ज़्यादा नहीं चाहिए— बस इंसान की तरह जीना आए।