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मैं दो राहों पर खड़ी हूँ

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  मैं दो राहों पर खड़ी हूँ (अंतर्द्वंद की एक पुकार) मैं दो राहों पर खड़ी हूँ, ना पूर्ण अंधेरा, ना पूर्ण रौशनी। एक ओर स्वप्नों की चमकती काया, दूजी ओर आत्मा की मौन परछाईं। यह कोई मोड़ नहीं... यह कोई साधारण चुनाव नहीं, यह प्रश्न है — "मैं कौन हूँ?" और किस ओर मेरा सत्य सधता है? एक राह — जहाँ चाहतें रंग भरती हैं, भीड़ है, तालियाँ हैं, छलने वाली मुस्कानें हैं। दूसरी — एकांत की सूनी धरती, जहाँ हर कदम एक प्रश्न बन जाता है। एक में मैं दिखती हूँ दुनिया को, दूसरी में मैं देखती हूँ खुद को। एक में गति है — पर दिशा अनजानी, दूसरी में ठहराव है — पर अंतरज्योति की रवानी। हर राह अपने तर्क लिए खड़ी है, जैसे मेरी ही परछाई मुझसे बहस कर रही हो। मन की तहों में कोई पुरानी आवाज़ कहती है — "क्या खो दोगी, अगर सब पा भी लिया?" कभी लगता — जो सरल लगे, वही ठीक, कभी लगता — जो भीतर हिला दे, वही सच्चा सीख। मैं चुप हूँ, फिर भी भीतर शोर है, हर उत्तर से पहले एक नया ‘क्यों’ है। मैं दो राहों पर खड़ी हूँ — न निर्णायक, न भ्रमित, बस उस पल में जहाँ इंसान अपने होने की गहराई को छूता ह...

जीवन की राह # PATH OF LIFE

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🌿 जीवन की राह 🌿 जीवन की राह कोई सीधी रेखा नहीं, कभी कांटे, कभी फूलों की परछाई कहीं। कभी धूप में तपता निःशब्द द्वार, कभी बारिशों में भीगता प्यार। कभी मंज़िल पास लगे, पर न हो, कभी खो जाएँ रास्ते, फिर भी बहो। हर मोड़ सिखाता है कुछ नया, हर ठोकर बन जाती है अनुभव का काया। चाहे मिले अंधेरे, चाहे उजाले, मन में हो दीप, तो डर किसके हवाले? थोड़ी रुकावट, थोड़ी उड़ान, इन्हीं से बनती है जीने की जान। जो थक जाए, वो बैठ ले ज़रा, पर हार नहीं, ये विश्राम की कला। चलते रहो, चाहे धीमे सही, क्योंकि राहें रुकने वालों की नहीं। जीवन की राह है खुद एक गीत, कभी करुण, कभी मधुर संगीत। तू बस चलता चल विश्वास लिए, हर मोड़ पे तेरा सूरज खिले।