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मन की उलझन

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  मन की उलझ मन की उलझन, अनकहे से सवाल, खामोशी में छुपे हैं हज़ारों ख्याल। हँसी ओढ़े चेहरे, आँखों में नमी, भीड़ के बीच भी लगती है तन्हाई सी कभी। कभी सपने बुलाएँ, कभी डर रोक लें, कदम बढ़ें तो सही, पर राहें टोक लें। अपने ही फैसलों से लड़ता है मन, चाहे सुकून का घर, पर भटकता है हर क्षण। कभी बीते लम्हों की परछाईं सताए, कभी आने वाला कल बेचैन बनाए। ना पूरा अतीत छूट पाता है कहीं, ना भविष्य की तस्वीर साफ़ दिखती सही। मन की उलझन में भी छुपा है इक रास्ता, हर गाँठ के भीतर है साहस का वास्ता। थोड़ा ठहरो, खुद से बातें तो करो, इन उलझी लकीरों को धीरे-धीरे सुलझा लो । क्योंकि जो मन को समझ ले, वही जीत जाता है, हर उलझन के बाद नया सवेरा मुस्काता है। मन की उलझन ही बनती है पहचान, यहीं से शुरू होती है खुद से मिलने की उड़ान। 

​नया अस्तित्व

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​ खुद की ही परछाईं से, अब तक मैं अनजान रही, दबी रही जो भीतर कहीं, उस नारी से बेज़ुबान रही। दूसरों की नज़रों में खुद का अक्स तलाशती थी, मैं अपनी ही ताकत से, अब तक तो अनजान रही। ​पर अब पिघल गई हैं जंजीरें, जो सोच पर मेरी छाई थीं, वो सब बातें पीछे छूटीं, जो दुनिया ने सिखाई थीं। अब खुद के पास आ गई हूँ, खुद को मैं पहचान गई हूँ , पुराने सब लिबाज़ों को, अब मैं उतार आई हूँ । ​मैं वो स्त्री नहीं, जो कल तक सहमी-सहमी थी,  मैं वो नारी नहीं, जिसकी दुनिया बस वहमी थी। मैं अब अपनी धुन की लहर हूँ, खुद ही अपना किनारा हूँ, भटके हुए उस राही का, मैं चमकता हुआ सितारा हूँ। ​अपनी हिम्मत, अपनी मेहनत से, एक नया इतिहास सजाती हूँ, मैं  किसी और की छाया नहीं, खुद की पहचान बनाती हूँ।

ऐ नारी…

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ऐ नारी, तू है किस्मत की मारी — ये ताना अब पुराना है, अब खुद को ये जताना है और दुनिया को भी दिखाना है। जो शक्ति तेरे अंतरमन में है, वो सबसे अद्भुत, सबसे नयन है, जो चुप रहकर भी तू सह जाती है, वही मौन तेरा सबसे बड़ा वचन है। तू आँसू में भी आशा बोती है, हर ठोकर को सीढ़ी बनाती है, जहाँ रुकने को कहे ये दुनिया, वहीं से तू उड़ान लगाती है। तेरी कोमलता तेरी कमजोरी नहीं, तेरा धैर्य ही तेरी पहचान है, तू झुकी नहीं, बस ठहरी थी कभी, अब हर दिशा में तेरा ही नाम है। अब वक्त है खुद को पहचानने का, हर बंधन को तोड़ दिखाने का, ऐ नारी, तू सिर्फ कहानी नहीं, तू ही सृजन है, तू ही उड़ान है।