मन की उलझन

 मन की उलझ

मन की उलझन, अनकहे से सवाल,
खामोशी में छुपे हैं हज़ारों ख्याल।
हँसी ओढ़े चेहरे, आँखों में नमी,
भीड़ के बीच भी लगती है तन्हाई सी कभी।

कभी सपने बुलाएँ, कभी डर रोक लें,
कदम बढ़ें तो सही, पर राहें टोक लें।
अपने ही फैसलों से लड़ता है मन,
चाहे सुकून का घर, पर भटकता है हर क्षण।

कभी बीते लम्हों की परछाईं सताए,
कभी आने वाला कल बेचैन बनाए।
ना पूरा अतीत छूट पाता है कहीं,
ना भविष्य की तस्वीर साफ़ दिखती सही।

मन की उलझन में भी छुपा है इक रास्ता,
हर गाँठ के भीतर है साहस का वास्ता।
थोड़ा ठहरो, खुद से बातें तो करो,
इन उलझी लकीरों को धीरे-धीरे सुलझा लो

क्योंकि जो मन को समझ ले, वही जीत जाता है,
हर उलझन के बाद नया सवेरा मुस्काता है।
मन की उलझन ही बनती है पहचान,
यहीं से शुरू होती है खुद से मिलने की उड़ान। 

Comments

Popular posts from this blog

औरत को क्या चाहिए ?

​"ममत्व की ढाल"

"प्रेम: एक बौद्धिक संवाद"