मुक्ति
मुक्ति : मन का भाव
बंधन टूटें, मन उड़ चले,
जैसे पंख हों खुले गगन तले।
ना डर हो, ना चाह कोई,
बस शांति की लहर, और राह नई।
संघर्षों की धूप में जो जले,
वही जानते हैं छाँव के पल।
मुक्ति कोई मंज़िल नहीं,
एक अनुभव है, आत्मा का हल।
त्याग की अग्नि में तप कर,
अहम् को राख बनाना पड़ता है।
सच के दर्पण में झाँक कर,
स्व को पहचानना पड़ता है।
माया के मेले में उलझे हैं सब,
हर कोई खोजे अपने ही स्वरूप।
कोई धन में, कोई यश में,
पर मुक्ति मिले जब टूटे झूठ का रूप।
न सागर की गहराई में,
न पर्वत की ऊँचाई में।
वह तो है अंतर की एक थाह,
जहाँ ना शब्द हों, ना कोई राह।
मुक्ति है जब क्रोध पिघले प्रेम में,
जब द्वेष बदल जाए क्षमा के क्षेम में।
जब हृदय हो विशाल जैसे आकाश,
और जीवन हो सरल, निर्मल प्रकाश।
नहीं बंधनों से भाग जाना,
बल्कि बंधनों में रह कर मुस्कुराना।
मुक्ति है भीतर की वह लौ,
जो अंधेरों में भी जलती रहे खोखले भयों को धो।
साँसों की सरगम में छुपा राग है,
हर धड़कन में एक अनुराग है।
मुक्ति है प्रेम, मुक्ति है त्याग,
मुक्ति है आत्मा का अनुराग।
जब न हो कोई प्रश्न शेष,
न हो चाह का कोई विशेष।
तब मौन बोले, और मन सुने,
तब ब्रह्म भी झुककर खड़ा सुने।
चलते रहो, थको मत साथी,
ये पथ है कठिन, पर सच्चा साथी।
हर मोड़ पर एक पर्दा हटेगा,
हर कष्ट के बाद नया दीप जलेगा।
मुक्ति न कहीं बाहर बसती,
यह तो अंतःकरण में हस्ती।
जब ‘मैं’ और ‘मेरा’ मिट जाए,
तब ही असली ‘स्व’ उग आए।
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