दुविधा

दुविधा – अपने मन की सुनूँ या समाज की व्यवस्था?

(एक स्त्री की सोच में गूंजता सवाल)

चलती हूँ रोज़ उस राह पर,
जो वर्षों से बिछाई गई है,
जहाँ हर मोड़ पे लिखी हैं लकीरें,
जैसे किस्मत भी समाज ने बनाई है।

मन कहे—"उड़ चल, तोड़ दे बंधन,
जो तेरे पंखों को रोके",
पर समाज कहे—"मर्यादा रख,
ये उड़ान नहीं, भ्रम के धोखे।"

कभी चाहा किताबों में डूब जाना,
कभी मंचों पर बोल पड़ना,
पर कहा गया—"घर की लक्ष्मी बन,
ये बाहर की बातें छोड़ देना।"

मन के कोने में पलती है ख्वाहिश,
कि खुद को खुद में पाऊँ,
पर हर आवाज़ कहती है—
"पहले सबकी सोच में समाऊँ।"

कभी माँ की ममता बनकर झुकी,
कभी बहू की गरिमा में सिमटी,
कभी अपने सपनों से मुँह मोड़ा,
क्योंकि समाज की रीत न टूटी।

पर अब पूछती हूँ खुद से,
कब तक यही दोहराया जाएगा?
कब अपने मन की बात,
बिना डर के कहा जाएगा?

क्या सही है, क्या ग़लत,
ये मैं तय कर सकती हूँ,
सुनूंगी अब अपने भीतर की आवाज़,
जो सच की परिभाषा लिखती है।

व्यवस्था तब सुंदर है,
जब वो इंसानियत से जुड़ी हो,
पर जो मन को कैद करे,
वो सिर्फ़ एक रस्म अधूरी हो।

तो अब चलूँगी उसी राह पर,
जो मेरे मन से निकली हो,
संवेदनाओं की चुप दीवारें,
अब मेरी हिम्मत से हिली हो।

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