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आज की नारी

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आज की नारी  — स्वर की एक नई रागिनी वो नारी है, परिभाषा नई, संवेदन में तेज़, विचारों में ठनी। ना सीमाओं की कै़दी अब, वो उड़ान है खुली गगन-सी सधी। समझ की ज्योति से रोशन है, हर मोड़ पे खुद की पहरेदार है। सही-गलत की थाह रखे, वो आत्मा की पुकार है। ना चाह उसे अब सहारा किसी का, ना कोई मोहर लगे रिश्तों की वज़ा का। उसे साथी चाहिए, साया नहीं, जहाँ इज़्ज़त मिले, माया नहीं। न वो निर्भरता की बात करे, ना झूठे वादों से दिल बहलाए। वो साथी चाहे — संगदिल, जो मुस्कानों संग आँसू भी अपनाए। जो थामे हाथ, पर बाँधे नहीं, जो बोले साथ, पर आँखे नीची न करे कहीं। जो उसके गिरने में झुके नहीं, बल्कि थामे, और फिर से उठने की वजह बने वहीं। आज की नारी — स्वाभिमान की दीपिका, ना कोरी कल्पना, ना परछाईं किसी इतिहास की। वो चाहती है प्रेम, मगर बंधन नहीं, चाहती है साथ, मगर समर्पण में क्षय नहीं। वो नारी है — प्रेरणा, प्रकाश, संघर्षों की मृदु मधुर आवाज़। हर रिश्ते में बराबरी की बात करे, वो सिर्फ़ जिए नहीं — संपूर्णता से साथ करे। यही है आज की नारी की परिभाषा, नम्र भी है, पर अडिग उसकी भाषा। न साथ उसक...

आशा : जीवन की राह

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आशा  जब जीवन थमे साँसों की तरह, और चारों ओर छाए मौन प्रहर। जब उम्मीदें भी लगें थकी-हारी, और राहें हों पीड़ा की सवारी। जब शब्दों का भी साथ छूट जाए, और मन बस मौन में डूब जाए। तब जो अंतर में धीरे मुस्काए, वो आशा ही तो दीपक बन जाए। जो अश्रु को भी मोती में बदले, जो टूटे पलों में सपने गढ़े। जो वीराने में मधुर राग छेड़े, सूनी राहों में फिर रंग भरे। वो जो अधूरे स्वप्न समेटे, हर हार को नई दृष्टि से देखे। जो कहे – ‘अभी अंत नहीं हुआ’, हर गिरते क़दम को सहारा दे। जो अंधकार को भी समझाए बाती, और सन्नाटे में बो दे साज की थाती। जो पतझड़ में भी वसंत रचाए, हर पत्थर को मंदिर बनाए। हर छिन में जो उम्मीद का संचार करे, हर थमे पल में फिर से संसार भरे। जो टूटे दिलों में साहस की लौ जगाए, जो कहे – ‘तू फिर से उड़ पाए’। आशा – वो मौन शक्ति, वो छुपी आवाज़, जो हर अंत में रचती है एक नई शुरुआत। वो नन्हा दीप जो आँधियों में भी मुस्काए, हर दिल की अंतिम पर, पहली आस कहलाए।

दुविधा

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दुविधा – अपने मन की सुनूँ या समाज की व्यवस्था? (एक स्त्री की सोच में गूंजता सवाल) चलती हूँ रोज़ उस राह पर, जो वर्षों से बिछाई गई है, जहाँ हर मोड़ पे लिखी हैं लकीरें, जैसे किस्मत भी समाज ने बनाई है। मन कहे—"उड़ चल, तोड़ दे बंधन, जो तेरे पंखों को रोके", पर समाज कहे—"मर्यादा रख, ये उड़ान नहीं, भ्रम के धोखे।" कभी चाहा किताबों में डूब जाना, कभी मंचों पर बोल पड़ना, पर कहा गया—"घर की लक्ष्मी बन, ये बाहर की बातें छोड़ देना।" मन के कोने में पलती है ख्वाहिश, कि खुद को खुद में पाऊँ, पर हर आवाज़ कहती है— "पहले सबकी सोच में समाऊँ।" कभी माँ की ममता बनकर झुकी, कभी बहू की गरिमा में सिमटी, कभी अपने सपनों से मुँह मोड़ा, क्योंकि समाज की रीत न टूटी। पर अब पूछती हूँ खुद से, कब तक यही दोहराया जाएगा? कब अपने मन की बात, बिना डर के कहा जाएगा? क्या सही है, क्या ग़लत, ये मैं तय कर सकती हूँ, सुनूंगी अब अपने भीतर की आवाज़, जो सच की परिभाषा लिखती है। व्यवस्था तब सुंदर है, जब वो इंसानियत से जुड़ी हो, पर जो मन को कैद करे, वो सिर्फ़ एक रस्म अधूरी ...

मुक्ति

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  मुक्ति  :  मन का भाव बंधन टूटें, मन उड़ चले, जैसे पंख हों खुले गगन तले। ना डर हो, ना चाह कोई, बस शांति की लहर, और राह नई। संघर्षों की धूप में जो जले, वही जानते हैं छाँव के पल। मुक्ति कोई मंज़िल नहीं, एक अनुभव है, आत्मा का हल। त्याग की अग्नि में तप कर, अहम् को राख बनाना पड़ता है। सच के दर्पण में झाँक कर, स्व को पहचानना पड़ता है। माया के मेले में उलझे हैं सब, हर कोई खोजे अपने ही स्वरूप। कोई धन में, कोई यश में, पर मुक्ति मिले जब टूटे झूठ का रूप। न सागर की गहराई में, न पर्वत की ऊँचाई में। वह तो है अंतर की एक थाह, जहाँ ना शब्द हों, ना कोई राह। मुक्ति है जब क्रोध पिघले प्रेम में, जब द्वेष बदल जाए क्षमा के क्षेम में। जब हृदय हो विशाल जैसे आकाश, और जीवन हो सरल, निर्मल प्रकाश। नहीं बंधनों से भाग जाना, बल्कि बंधनों में रह कर मुस्कुराना। मुक्ति है भीतर की वह लौ, जो अंधेरों में भी जलती रहे खोखले भयों को धो। साँसों की सरगम में छुपा राग है, हर धड़कन में एक अनुराग है। मुक्ति है प्रेम, मुक्ति है त्याग, मुक्ति है आत्मा का अनुराग। जब न हो कोई प्रश्न शेष, ...

स्त्री का सफ़र : जीवन का संघर्ष

  स्त्री का सफ़र जनम लिया तो जश्न नहीं था, बस एक आहट सी आई, माँ की आँखों में डर था, पिता की पलकों में परछाई। गोदी में आई तो बोझ कहलाई, बचपन में ही सपनों की चिता जलाई। गुड़ियों से खेलने की चाह थी, पर हाथों में झाड़ू थमा दिया, स्कूल का दरवाज़ा देखा ही नहीं, चौका-बर्तन सिखा दिया। भाई को मिले परवाज़ के पंख, और मुझको मिल गईं बेड़ियाँ संग। यौवन आया तो पर्दे में छुपा दिया, अपनी ही हँसी को ग़लत बता दिया। दहलीज़ लांघी तो बदचलन कही गई, चुप रही तो कमज़ोर समझी गई। ब्याह हुआ तो नए बंधन मिले, अपनों के बीच भी अनजाने ग़म मिले। पति का ग़ुस्सा, सास की फटकार, हर दर्द पे चुप रहना ही था मेरा अधिकार। माँ बनी तो कलेजा चौड़ा हुआ, पर बेटी हुई तो घर का चेहरा कड़ा हुआ। सोचा था मेरी बच्ची उड़ सकेगी, पर उसकी भी तक़दीर मुझ-सी लिखी गई। रातें कटीं आँसुओं में भीगी, ख़ुद को समेटा, पर दुनिया ने छीनी हर सीढ़ी। चीख़ उठी जब, तो आवाज़ दबा दी, सपनों की अर्थी खुद अपने कंधों पर उठा ली। बूढ़ी हुई तो बस बोझ बनी, जिन्हें पाल-पोस कर बड़ा किया, आज उनकी आँखों में चुभती रही। आख़िर में चिता की आग ही साथ...

"ख़ुशी मेरे ही अंदर है"

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  "ख़ुशी मेरे ही अंदर है" क्यों आज भी ख़ुशी की तलाश है? जब वो तो मेरे ही पास है, क्यों भाग रही हूँ अनजानी राहों पर? जब मेरा ही मन एक उजली आस है, बाहर भटकती नज़रों से, दिल की गहराइयों को क्यों ना देखूँ मैं? जहाँ हर धड़कन गा रही है गीत, फिर क्यों ख़ामोश रहूँ मैं? ख़ुशी का पीछा या उसका एहसास? सपनों के पीछे भाग रही हूँ, पर सुकून तो मेरे क़दमों में है, जो पाने की चाह में खो गया, वो शायद मेरे मन में है। हर मंज़िल पर रुककर देखा, पर अधूरा सा कुछ हर बार लगा, आकाश छूने की चाह में, ज़मीन का सौंधापन छूट गया। बचपन की हंसी और आज की उलझन कभी हँसी थी खिलखिलाती, बेवजह भी मुस्कुराती, अब क्यों चेहरे पे शिकन है? जब ख़ुशी मेरी अपनी धड़कन है, वो बेपरवाह दिन, वो नटखट पल, कहाँ खो गए समय के साथ? अब मुस्कुराने के भी कारण खोजती हूँ, क्या भूल गई वो मासूम सी बात? खुद से सवाल आईना जब भी देखती हूँ, एक सवाल सा खड़ा मिलता है, क्यों खोज रही हूँ रौशनी को? जब सूरज मुझमें ही जलता है क्यों मांगती हूँ औरों से रोशनी? जब खुद का उजाला कम नहीं क्यों ढूँढती हूँ सहारा किसी का? जब खुद का...

मैं खुश हूँ:कविता

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मैं खुश हूँ  सुबह की पहली किरण के साथ, जब नींद अभी अधूरी थी, मैं जाग गई, घर जागा नहीं, सपनों की चाय फिर ठंडी पड़ी। चूल्हा पहले जला, फिर उम्मीदें, पर मैं नहीं जली, मैं खुश हूँ। बचपन में गुड्डे-गुड़ियों के खेल, पर दुनिया ने सिखाया सब्र का मेल। "लड़कियाँ धीरे बोलती हैं", "अच्छे घर की बेटियाँ कम हँसती हैं।" पर मैंने हँसी नहीं रोकी, अब भी गूँजती हूँ, मैं खुश हूँ। कभी किताबों में डूबी, कभी रसोई में खोई, कभी सपनों के पंख लगे, कभी परवाह में रोई। पढ़ने निकली थी आकाश छूने, पर सीली आँखों से विदाई हुई, बाबुल का घर छूटा, पर खुद को नहीं छोड़ा, अब भी चल रही हूँ, मैं खुश हूँ। ब्याह के बाद घर मिला, पर कमरा नहीं, रिश्ते मिले, पर जगह नहीं। कभी ‘बहू’, कभी ‘माँ’, कभी ‘पत्नी’ बन गई, पर मैं? मैं कहाँ रह गई? खुद की तलाश में उलझी, अब भी ढूंढ रही हूँ, मैं खुश हूँ। तन की साड़ी में लिपटे मन के सवाल, क्या मैं बस ये ही हूँ? रात के खाने से सुबह की धूप तक, सपनों से हकीकत के टूट तक, सबका ख्याल रखा, पर खुद को ही भूली, फिर भी हँस रही हूँ, मैं खुश हूँ। रोज़ की भाग-दौड़, र...