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अब मैं सँभलना चाहती हूँ

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कभी-कभी ज़िंदगी में कोई बड़ा बदलाव बाहर से दिखाई नहीं देता। बस भीतर कहीं एक आवाज़ जन्म लेती है “अब मैं खुद को समझना चाहती हूँ… अब मैं खुद को जीना चाहती हूँ।” यह कविता उसी छोटी-सी लेकिन गहरी शुरुआत की कहानी है एक ऐसी स्त्री की, जो कभी खुद में उलझी हुई थी, और अब धीरे-धीरे खुद को समझते हुए, अपना हाथ थामकर आगे बढ़ना सीख रही है। क्योंकि बदलना हमेशा किसी और के लिए नहीं होता… कभी-कभी बदलाव का सबसे खूबसूरत अर्थ होता है अपने पास वापस लौटना। एक उलझी हुई-सी मैं थी, जो अब सुलझना चाहती हूँ, मन की अनकही गिरहों को धीरे-धीरे खोलना चाहती हूँ। एक दबी हुई-सी मैं थी, जो अब उठना चाहती हूँ, अपने ही भीतर सोई हुई एक नई सुबह जगाना चाहती हूँ। एक मैं थी, जो जीने का मतलब नहीं जानती थी, हर दिन को बस गुज़रता हुआ एक दिन मानती थी। पर एक मैं अब हूँ जो जीना चाहती हूँ, हर साँस को महसूस करना, हर पल को अपना कहना चाहती हूँ। एक मैं थी जो खुद को पीछे रखती रही, दूसरों की उम्मीदों में अपनी आवाज़ खोती रही। पर एक मैं अब हूँ जो खुद को सुनना चाहती हूँ, अपनी इच्छाओं को समझना, अपने सपनों को चुनना चाहती हूँ। अब मैं टूटे हुए कल की परछ...