“खुद से मुलाक़ात”
“खुद से मुलाक़ात”
कुछ उलझी हुई, कुछ सुलझी हुई,
मैं प्रश्न बनी, मैं ही उत्तर हूँ,
बाहरी जग में जितना खोजा,
उतना ही भीतर से बिखरती हूँ।
आईनों में चेहरा दिखा हर बार,
पर “मैं” का दर्शन हो न सका,
जो दिखता था वो आवरण था,
अंतर का सत्य छू न सका।
दुनिया के स्वर, जग के बंधन,
मुझमें ही आकर बसते रहे,
मैं मौन रही, मैं शून्य बनी,
अपने ही भीतर धँसते रहे।
फिर एक क्षण ऐसा भी आया—
जब सब कुछ जैसे थम-सा गया,
न कोई बाहर, न कोई भीतर,
बस “मैं” का साक्षी जग-सा गया।
मैं निकली फिर उस पथ पर,
जहाँ न दिशा, न कोई छोर,
बस श्वासों की धीमी गति में,
खुद का स्पंदन, खुद का शोर।
परत-दर-परत हटाती गई मैं,
हर झूठा नाम, हर एक रूप,
जो बचा अंत में, वही सत्य था—
निर्विकार, निःशब्द, अनूप।
वो “मैं” न तन, न मन की सीमा,
न समय, न कोई पहचान,
वो शुद्ध चैतन्य, शांत अग्नि-सा,
जिसमें लय हो हर अज्ञान।
अब न कोई खोज, न दूरी शेष,
न पाने की कोई प्यास रही,
मैं ही साधक, मैं ही साध्य,
मैं ही राह, मैं ही आस रही।
और जब मिलन हुआ खुद से,
तो जाना—मैं कहीं गई ही न थी,
जिसे ढूंढती रही जग में,
वो “मैं” तो सदा यहीं थी। ✨

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