नया अस्तित्व
खुद की ही परछाईं से, अब तक मैं अनजान रही,
दबी रही जो भीतर कहीं, उस नारी से बेज़ुबान रही।
दूसरों की नज़रों में खुद का अक्स तलाशती थी,
मैं अपनी ही ताकत से, अब तक तो अनजान रही।
पर अब पिघल गई हैं जंजीरें, जो सोच पर मेरी छाई थीं,
वो सब बातें पीछे छूटीं, जो दुनिया ने सिखाई थीं।
अब खुद के पास आ गई हूँ, खुद को मैं पहचान गई हूँ ,
पुराने सब लिबाज़ों को, अब मैं उतार आई हूँ ।
मैं वो स्त्री नहीं, जो कल तक सहमी-सहमी थी,
मैं वो नारी नहीं, जिसकी दुनिया बस वहमी थी।
मैं अब अपनी धुन की लहर हूँ, खुद ही अपना किनारा हूँ,
भटके हुए उस राही का, मैं चमकता हुआ सितारा हूँ।
अपनी हिम्मत, अपनी मेहनत से, एक नया इतिहास सजाती हूँ,
मैं किसी और की छाया नहीं, खुद की पहचान बनाती हूँ।

very nice lines ma'am...
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