“पंख फैला आज तू”
“पंख फैला आज तू”
पंख फैला आज तू, नभ को छूना सीख ले,
डर को पीछे छोड़कर, खुद को जीना सीख ले।
बाँध मत अरमान को, खोल दे सपनों के पर,
तेरे साहस के तले, कांप उठेगा ये शहर।
कब तलक यूँ झुकेगी, कब तलक यूँ हारती?
कब तलक डर-डर के तू, खुद से ही किनारती?
तेरे भीतर ज्वाला है, तू ही शक्ति, तू ही शंख,
बस भरोसा कर ज़रा, टूट जाएगा हर बंध।
तोड़ दे ये जंजीरें, अब समय है बोलने का,
वक्त है उड़ जाने का, अपनी राह खोलने का।
दुनिया तेरे संग चले, जब तू कदम बढ़ाएगी,
तेरी आवाज़ बनके ही, धरती गूंज जाएगी।
आज अगर उठेगी तू, कल तेरा मान होगा,
तेरे जज़्बे के आगे, झुका सारा जहान होगा।
पंख फैला, उड़ चल अब, थाम ले अपनी दिशा,
तेरे दम से जग उठे, गूंजे नारी की दशा।
👌
ReplyDeleteBeautiful poem. But couldn’t find poet /poetess name?
DeleteSir this is from blog "Her Voice" written by Rajni Panwar
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