"प्रेम: एक बौद्धिक संवाद"

 शीर्षक: "प्रेम: एक बौद्धिक संवाद"


प्रेम क्या है? केवल स्पर्श का नाम नहीं,
यह तो आत्मा की भाषा है, कोई जाम नहीं।
ना वह आँखों की नमी में सिमटता है,
ना ही वचनबद्ध वादों में बँधता है।

यह तर्क से टकराता है, फिर भी जीतता है,
मन की गणनाओं में भी यह संगीत सा रीझता है।
यह कोई संयोग नहीं, चेतना की पुकार है,
एक आत्मा दूसरी को जब पहचान ले, वही सार है।

यह केवल हृदय की थरथराहट नहीं,
यह बुद्धि की प्रश्नावली में भी एक स्पष्ट हाँ है कहीं।
जहाँ सोच और भावना का संतुलन होता है,
वहीं प्रेम अपनी परिभाषा में खड़ा होता है।

यह क्रांति भी है - चुप सी, मगर साहसी,
जो रूढ़ियों से टकरा जाए, वो प्रेम सच्चा और स्पष्टावासी।
यह स्त्री के जीवन में कोई दया नहीं,
बल्कि उसकी शक्ति का, उसकी चेतना का गान है वहीं।

कभी वह कबीर की उलझी उलटबांसियाँ है,
तो कभी मीरा की सरल मगर अथाह भक्ति-भावनाएँ हैं।
वह तर्क की कसौटी पर भी खरा उतरता है,
जब कोई स्त्री अपने आप को प्रेम करती है — तब समझ आता है।

प्रेम वह है जो "स्वयं" से शुरू होकर "साथ" तक पहुँचता है,
जहाँ अधूरी नहीं, पूरी स्त्री खड़ी होती है।
ना किसी इज़ाज़त की मोहताज, ना किसी नाम की परछाईं में,
वह प्रेम करती है -अपने समत्व की ऊँचाई में।

Her Voice में यह आवाज़ है 
जहाँ प्रेम अब निर्भरता नहीं,
बल्कि चेतन संवाद है,
एक स्त्री का स्वयं से, और जग से निर्विवाद संवाद है

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

औरत को क्या चाहिए ?

​"ममत्व की ढाल"