मैं दो राहों पर खड़ी हूँ

 मैं दो राहों पर खड़ी हूँ

(अंतर्द्वंद की एक पुकार)

मैं दो राहों पर खड़ी हूँ,
ना पूर्ण अंधेरा, ना पूर्ण रौशनी।
एक ओर स्वप्नों की चमकती काया,
दूजी ओर आत्मा की मौन परछाईं।

यह कोई मोड़ नहीं...
यह कोई साधारण चुनाव नहीं,
यह प्रश्न है — "मैं कौन हूँ?"
और किस ओर मेरा सत्य सधता है?

एक राह — जहाँ चाहतें रंग भरती हैं,
भीड़ है, तालियाँ हैं, छलने वाली मुस्कानें हैं।
दूसरी — एकांत की सूनी धरती,
जहाँ हर कदम एक प्रश्न बन जाता है।

एक में मैं दिखती हूँ दुनिया को,
दूसरी में मैं देखती हूँ खुद को।
एक में गति है — पर दिशा अनजानी,
दूसरी में ठहराव है — पर अंतरज्योति की रवानी।

हर राह अपने तर्क लिए खड़ी है,
जैसे मेरी ही परछाई मुझसे बहस कर रही हो।
मन की तहों में कोई पुरानी आवाज़ कहती है —
"क्या खो दोगी, अगर सब पा भी लिया?"

कभी लगता — जो सरल लगे, वही ठीक,
कभी लगता — जो भीतर हिला दे, वही सच्चा सीख।
मैं चुप हूँ, फिर भी भीतर शोर है,
हर उत्तर से पहले एक नया ‘क्यों’ है।

मैं दो राहों पर खड़ी हूँ —
न निर्णायक, न भ्रमित,
बस उस पल में जहाँ
इंसान अपने होने की गहराई को छूता है।

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

औरत को क्या चाहिए ?

​"ममत्व की ढाल"

"प्रेम: एक बौद्धिक संवाद"