आशा : जीवन की राह

आशा 


जब जीवन थमे साँसों की तरह,
और चारों ओर छाए मौन प्रहर।
जब उम्मीदें भी लगें थकी-हारी,
और राहें हों पीड़ा की सवारी।

जब शब्दों का भी साथ छूट जाए,
और मन बस मौन में डूब जाए।
तब जो अंतर में धीरे मुस्काए,
वो आशा ही तो दीपक बन जाए।

जो अश्रु को भी मोती में बदले,
जो टूटे पलों में सपने गढ़े।
जो वीराने में मधुर राग छेड़े,
सूनी राहों में फिर रंग भरे।

वो जो अधूरे स्वप्न समेटे,
हर हार को नई दृष्टि से देखे।
जो कहे – ‘अभी अंत नहीं हुआ’,
हर गिरते क़दम को सहारा दे।

जो अंधकार को भी समझाए बाती,
और सन्नाटे में बो दे साज की थाती।
जो पतझड़ में भी वसंत रचाए,
हर पत्थर को मंदिर बनाए।

हर छिन में जो उम्मीद का संचार करे,
हर थमे पल में फिर से संसार भरे।
जो टूटे दिलों में साहस की लौ जगाए,
जो कहे – ‘तू फिर से उड़ पाए’।

आशा – वो मौन शक्ति, वो छुपी आवाज़,
जो हर अंत में रचती है एक नई शुरुआत।
वो नन्हा दीप जो आँधियों में भी मुस्काए,
हर दिल की अंतिम पर, पहली आस कहलाए।

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