स्त्री का सफ़र : जीवन का संघर्ष

 स्त्री का सफ़र

जनम लिया तो जश्न नहीं था, बस एक आहट सी आई,
माँ की आँखों में डर था, पिता की पलकों में परछाई।
गोदी में आई तो बोझ कहलाई,
बचपन में ही सपनों की चिता जलाई।

गुड़ियों से खेलने की चाह थी, पर हाथों में झाड़ू थमा दिया,
स्कूल का दरवाज़ा देखा ही नहीं, चौका-बर्तन सिखा दिया।
भाई को मिले परवाज़ के पंख,
और मुझको मिल गईं बेड़ियाँ संग।

यौवन आया तो पर्दे में छुपा दिया,
अपनी ही हँसी को ग़लत बता दिया।
दहलीज़ लांघी तो बदचलन कही गई,
चुप रही तो कमज़ोर समझी गई।

ब्याह हुआ तो नए बंधन मिले,
अपनों के बीच भी अनजाने ग़म मिले।
पति का ग़ुस्सा, सास की फटकार,
हर दर्द पे चुप रहना ही था मेरा अधिकार।

माँ बनी तो कलेजा चौड़ा हुआ,
पर बेटी हुई तो घर का चेहरा कड़ा हुआ।
सोचा था मेरी बच्ची उड़ सकेगी,
पर उसकी भी तक़दीर मुझ-सी लिखी गई।

रातें कटीं आँसुओं में भीगी,
ख़ुद को समेटा, पर दुनिया ने छीनी हर सीढ़ी।
चीख़ उठी जब, तो आवाज़ दबा दी,
सपनों की अर्थी खुद अपने कंधों पर उठा ली।

बूढ़ी हुई तो बस बोझ बनी,
जिन्हें पाल-पोस कर बड़ा किया,
आज उनकी आँखों में चुभती रही।
आख़िर में चिता की आग ही साथी बनी,
पर वहाँ भी जलने से पहले ताने सुने –
“बेचारी... बस एक औरत ही थी।”

यूँ ही जिया, यूँ ही चला सफ़र,
ना मिला सुकून, ना मिला मुक़द्दर।
बस एक औरत थी, बस एक कहानी थी,
जिसकी तक़दीर समाज ने पहले ही बेमानी लिख दी।

फिर भी हर जनम, मैं औरत ही बनूँगी,
हर घुटन के बाद भी, चिंगारी सी जलूँगी।
एक दिन मेरी चिता से आग उठेगी,
और हर औरत की तक़दीर नई लिखेगी।

इस कविता में एक औरत की ज़िंदगी के संघर्षों को दर्शाया गया है, जो जन्म से लेकर मृत्यु तक सिर्फ़ इसीलिए कष्ट सहती है क्योंकि वह एक लड़की है।

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