तनिका सरकार और उनकी नवीनतम पुस्तक
RELIGION & WOMEN IN INDIA
तनिका सरकार की नवीनतम पुस्तक "धर्म और महिलाएँ भारत में: लिंग, आस्था और राजनीति 1780 के दशक से 1980 के दशक तक" (Religion
& Women in India: Gender, Faith, and Politics 1780s-1980s) एक
महत्वाकांक्षी कृति है, जो दो शताब्दियों तक फैली हुई है। यह
पुस्तक 1780 के दशक से 1980 के दशक तक
भारत में लिंग, धर्म और राजनीति के अंतर्संबंधों का व्यापक
सर्वेक्षण प्रस्तुत करती है। इसकी महत्त्वाकांक्षा का दायरा और भी बढ़ जाता है
क्योंकि इसमें “धर्म” और “आस्था” की परिभाषाओं को व्यापक रूप से देखा गया है, जो इस
दौरान हुए अन्य सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों से भी गहराई से जुड़े हुए
हैं—जैसे कि नए बाजार संबंध, संविदात्मक श्रम व्यवस्थाएँ,
राजनीतिक उतार-चढ़ाव और व्यापक सांस्कृतिक बदलाव।
इसके अलावा, सरकार, किसी भी समकालीन
नारीवादी की तरह, यह मानती हैं कि लिंग केवल जैविक यौन भेदों
पर आधारित नहीं है, क्योंकि ये भेद वर्ग, जाति, क्षेत्र और ऐतिहासिक संदर्भों जैसी विभिन्न
सामाजिक-राजनीतिक संरचनाओं में उलझे हुए हैं, जो मिलकर लिंग
व्यवस्था को निर्मित करते हैं।
पुस्तक में प्रमुख ऐतिहासिक क्षणों का
विश्लेषण
पहले अध्याय में प्रस्तुत इस
दृष्टिकोण के भीतर, यह पुस्तक कुछ
महत्वपूर्ण ऐतिहासिक क्षणों का विश्लेषण करती है, शुरुआत
करते हुए 18वीं शताब्दी से।
प्रत्येक चरण में यह देखा गया है कि आंतरिक पितृसत्ता और जातिगत पदानुक्रम किस
प्रकार कार्य करता है—या तो औपनिवेशिक व्यवस्था के साथ समानांतर रूप से या उससे
टकराव में।
1. औपनिवेशिक शासन और
स्त्री अधिकार
पहला क्षण औपनिवेशिक शासन द्वारा
"धार्मिक" नियमों और विवाह व पारिवारिक प्रथाओं को कानूनी रूप देने का
है। इस दौरान, महिलाओं की निम्न
स्थिति (जैसे बाल विवाह, स्त्री भ्रूण हत्या)
को उपनिवेशवादियों द्वारा भारत में सुधार और शासन के औचित्य के रूप
में प्रस्तुत किया गया।
2. 19वीं शताब्दी:
सामाजिक सुधार बनाम परंपरावाद
दूसरा क्षण 19वीं शताब्दी के दौरान सामाजिक सुधारकों और
परंपरावादियों के बीच चले आंतरिक संघर्षों पर केंद्रित है, जहाँ हर समुदाय—ईसाई, मुस्लिम, सिख, दलित और हिंदू—ने अपने-अपने तरीके से लिंग की
परिभाषा को "पुनःनिर्मित" किया। इस अध्याय में केवल पुरुष सुधारकों की
ही चर्चा नहीं की गई है, बल्कि कुछ विद्रोही महिलाओं की
भूमिका को भी सामने लाया गया है। यहाँ औपनिवेशिक सरकार को एक आधुनिकतावादी
शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि "रूढ़िवादी, भयभीत और असमंजस से भरी" संस्था के रूप में दिखाया गया है, जो बार-बार
शक्तिशाली पारंपरिक अभिजात वर्ग के सामने झुकती रही।
3. 20वीं शताब्दी:
राष्ट्रवाद और स्त्री का स्थान
19वीं शताब्दी से होते
हुए, यह चर्चा 20वीं शताब्दी के
आरंभिक वर्षों तक पहुँचती है, जहाँ
हिंदू राष्ट्रवादी भय और महिला की कामुकता का मुद्दा प्रमुखता से उभरता है।
इस दौर में हिंदू राष्ट्रवादियों को हिंदू जनसंख्या में गिरावट और मुस्लिम
समुदाय की बढ़ती जन्म दर को लेकर चिंता थी। इसी समय, सरकार
कहती हैं, स्त्री का शरीर सार्वजनिक दृष्टि में आया और
धीरे-धीरे एक "कथनीय, लेखनीय और पठनीय" विषय बन
गया।
तनिका सरकार: जीवन परिचय और करियर
तनिका सरकार का जन्म भारत में हुआ था, उन्होंने इतिहास और नारीवादी अध्ययन में अपना करियर बनाया और
भारतीय इतिहास, राजनीति और स्त्री-अधिकारों पर महत्वपूर्ण
योगदान दिया।
शिक्षा और
अकादमिक करियर
तनिका सरकार ने अपनी उच्च शिक्षा जवाहरलाल
नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से प्राप्त की। उन्होंने इतिहास के क्षेत्र में शोध
किया और बाद में JNU में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत रहीं। इसके अलावा, उन्होंने येल
विश्वविद्यालय, शिकागो विश्वविद्यालय और अशोका
विश्वविद्यालय में भी अध्यापन किया।
शोध और लेखन
कार्य
वह इतिहास और नारीवादी अध्ययन की विशेषज्ञ हैं और उन्होंने कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें शामिल हैं:
- "हिंदू वाइफ, हिंदू नेशन: कम्युनिटी, रिलिजन और कल्चरल
नेशनलिज़्म"
- "रिबेल्स, वाइव्स, सेंट्स: डिज़ाइनिंग सेल्व्स एंड नेशंस
इन कोलोनियल टाइम्स"
- "भारत में हिंदू
राष्ट्रवाद"
उनका शोध कार्य मुख्य रूप से आधुनिक भारतीय इतिहास, सांप्रदायिक राजनीति, और महिला आंदोलनों पर केंद्रित रहा है। उन्होंने भारतीय समाज में स्त्री-विमर्श और धार्मिक राजनीति को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
व्यक्तिगत जीवन
तनिका सरकार ने इतिहासकार सुमित
सरकार से विवाह किया था। सुमित सरकार भी भारतीय इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान थे
और उनके साथ मिलकर उन्होंने भारतीय इतिहास और समाज पर गहन शोध किया। उनका जीवन और
करियर भारतीय इतिहास लेखन और नारीवादी अध्ययन में अमूल्य योगदान के लिए जाना जाता
है।
यह पुस्तक क्यों महत्वपूर्ण है?
यह पुस्तक नारीवादियों, इतिहासकारों, और राजनीति के
छात्रों के लिए अत्यंत
मूल्यवान है। यह दिखाती है कि कैसे भारतीय समाज में लिंग आधारित नियम और
धार्मिक प्रथाएँ समय के साथ बदलती रही हैं और स्त्रियों के अधिकारों पर इसका
क्या प्रभाव पड़ा। सरकार की यह पुस्तक धर्म, राजनीति और स्त्री-अधिकारों के जटिल संबंधों को एक नई दृष्टि से देखने का अवसर प्रदान करती है।
उनका शोध कार्य स्त्री-विमर्श, उपनिवेशवादी इतिहास और हिंदू राष्ट्रवाद पर केंद्रित
रहा है। उनकी लेखनी ने इतिहास को पुनःपरिभाषित करने और भारतीय समाज की गहरी
संरचनाओं को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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