Posts

“पंख फैला आज तू”

Image
“पंख फैला आज तू” पंख फैला आज तू, नभ को छूना सीख ले, डर को पीछे छोड़कर, खुद को जीना सीख ले। बाँध मत अरमान को, खोल दे सपनों के पर, तेरे साहस के तले, कांप उठेगा ये शहर। कब तलक यूँ झुकेगी, कब तलक यूँ हारती? कब तलक डर-डर के तू, खुद से ही किनारती? तेरे भीतर ज्वाला है, तू ही शक्ति, तू ही शंख, बस भरोसा कर ज़रा, टूट जाएगा हर बंध। तोड़ दे ये जंजीरें, अब समय है बोलने का, वक्त है उड़ जाने का, अपनी राह खोलने का। दुनिया तेरे संग चले, जब तू कदम बढ़ाएगी, तेरी आवाज़ बनके ही, धरती गूंज जाएगी। आज अगर उठेगी तू, कल तेरा मान होगा, तेरे जज़्बे के आगे, झुका सारा जहान होगा। पंख फैला, उड़ चल अब, थाम ले अपनी दिशा, तेरे दम से जग उठे, गूंजे नारी की दशा।

नयी राह मिली है अब, उस पर चलने वाली हूँ

Image
  नई राह मिली है अब नयी राह मिली है अब, उस पर चलने वाली हूँ, जो अब तक ना जाना था, वो सब अब जानने वाली हूँ। छोटे-छोटे ख़्वाबों को अब बड़ा बनाने वाली हूँ, ख़ुद के लिए, पहली बार, जीने वाली हूँ। अब तक जो बंधनों में बँधी रही चुपचाप, आज उस चुप्पी से बाहर निकल रही हूँ बेहिसाब। जिन सवालों से डरती थी, अब पूछने वाली हूँ, हर जवाब को अपना सच समझने वाली हूँ। ज़िन्दगी की उस किताब में जो पन्ना खाली था, अब उसमें अपने नाम की कहानी लिखने वाली हूँ। जो भी अधूरा था, अब उसे पूरा करने वाली हूँ, जो खुद से दूरी थी, वो अब पास लाने वाली हूँ। अब कोई और मंज़िल नहीं बताएगा मुझे, मैं अपने नक़्शे खुद बनाने वाली हूँ। भीड़ में खोई थी जो आवाज़ मेरी, अब उसी आवाज़ को पहचान दिलाने वाली हूँ। ये राह नयी है, पर मैं डरी नहीं हूँ, हर कांटे पर अब मुस्कुरा के चलने वाली हूँ। जो अब तक छूट गया था, वो सब अब खुद से जोड़ने वाली हूँ। नयी राह मिली है अब, उस पर चलने वाली हूँ, जो अब तक ना जिया था, उस जीवन को जीने वाली हूँ। "Her Voice"   कविता उस हर स्त्री के लिए है जो अब पहली बार खुद के लिए जी रही है।...

हिम्मत कर ले आज तू, तो जंग जीत जाएगी

Image
हिम्मत कर ले आज तू, तो जंग जीत जाएगी अपनी ख़ुशियों की ख़ातिर, किसको दोष ठहराएगी? हिम्मत कर ले आज तू, तो जंग जीत जाएगी, हर आँधी से टकरा के, खुद को सींच पाएगी। अभी तो बस शुरुआत है, मंज़िल बहुत दूर नहीं, तेरे क़दमों की आवाज़ से, अब खामोशी भी चीर जाएगी। अपनी ख़ुशियों की ख़ातिर, किसको दोष ठहराएगी? कभी हालात, कभी रिश्ता, क्या खुद को ना आजमाएगी? जो टूटा था, वो सपना फिर से जोड़े हाथों से, आशाएँ खुद लिख डालेगी, ना तक़दीर से डर पाएगी। तेरे आंसू भी तेरी ताक़त हैं, याद रख ये बात, हर दर्द से तू निकलेगी, बनकर खुद की सौगात। ज़िम्मेदारियाँ हैं बहुत, पर ज़रा खुद को भी समझ, तू भी कोई रिश्ता है, बस औरों का नाम नहीं। जो बीत गया, वो वक्त था, अब तू वक्त बन जाएगी, हिम्मत कर ले आज तू, तो जंग जीत जाएगी। अपनी ख़ुशियों की ख़ातिर, बहानों में क्या रखा है? अब खुद को थाम ले तू, ये सफ़र तेरा ही लिखा है। हिम्मत कर ले आज तू, तो जंग जीत जाएगी अपनी ख़ुशियों की ख़ातिर, किसको दोष ठहराएगी?

"प्रेम: एक बौद्धिक संवाद"

Image
  शीर्षक: "प्रेम: एक बौद्धिक संवाद" प्रेम क्या है? केवल स्पर्श का नाम नहीं, यह तो आत्मा की भाषा है, कोई जाम नहीं। ना वह आँखों की नमी में सिमटता है, ना ही वचनबद्ध वादों में बँधता है। यह तर्क से टकराता है, फिर भी जीतता है, मन की गणनाओं में भी यह संगीत सा रीझता है। यह कोई संयोग नहीं, चेतना की पुकार है, एक आत्मा दूसरी को जब पहचान ले, वही सार है। यह केवल हृदय की थरथराहट नहीं, यह बुद्धि की प्रश्नावली में भी एक स्पष्ट हाँ है कहीं। जहाँ सोच और भावना का संतुलन होता है, वहीं प्रेम अपनी परिभाषा में खड़ा होता है। यह क्रांति भी है - चुप सी, मगर साहसी, जो रूढ़ियों से टकरा जाए, वो प्रेम सच्चा और स्पष्टावासी। यह स्त्री के जीवन में कोई दया नहीं, बल्कि उसकी शक्ति का, उसकी चेतना का गान है वहीं। कभी वह कबीर की उलझी उलटबांसियाँ है, तो कभी मीरा की सरल मगर अथाह भक्ति-भावनाएँ हैं। वह तर्क की कसौटी पर भी खरा उतरता है, जब कोई स्त्री अपने आप को प्रेम करती है — तब समझ आता है। प्रेम वह है जो "स्वयं" से शुरू होकर "साथ" तक पहुँचता है, जहाँ अधूरी नहीं, पूरी स्त्री ख...

मैं दो राहों पर खड़ी हूँ

Image
  मैं दो राहों पर खड़ी हूँ (अंतर्द्वंद की एक पुकार) मैं दो राहों पर खड़ी हूँ, ना पूर्ण अंधेरा, ना पूर्ण रौशनी। एक ओर स्वप्नों की चमकती काया, दूजी ओर आत्मा की मौन परछाईं। यह कोई मोड़ नहीं... यह कोई साधारण चुनाव नहीं, यह प्रश्न है — "मैं कौन हूँ?" और किस ओर मेरा सत्य सधता है? एक राह — जहाँ चाहतें रंग भरती हैं, भीड़ है, तालियाँ हैं, छलने वाली मुस्कानें हैं। दूसरी — एकांत की सूनी धरती, जहाँ हर कदम एक प्रश्न बन जाता है। एक में मैं दिखती हूँ दुनिया को, दूसरी में मैं देखती हूँ खुद को। एक में गति है — पर दिशा अनजानी, दूसरी में ठहराव है — पर अंतरज्योति की रवानी। हर राह अपने तर्क लिए खड़ी है, जैसे मेरी ही परछाई मुझसे बहस कर रही हो। मन की तहों में कोई पुरानी आवाज़ कहती है — "क्या खो दोगी, अगर सब पा भी लिया?" कभी लगता — जो सरल लगे, वही ठीक, कभी लगता — जो भीतर हिला दे, वही सच्चा सीख। मैं चुप हूँ, फिर भी भीतर शोर है, हर उत्तर से पहले एक नया ‘क्यों’ है। मैं दो राहों पर खड़ी हूँ — न निर्णायक, न भ्रमित, बस उस पल में जहाँ इंसान अपने होने की गहराई को छूता ह...

जीवन की राह # PATH OF LIFE

Image
🌿 जीवन की राह 🌿 जीवन की राह कोई सीधी रेखा नहीं, कभी कांटे, कभी फूलों की परछाई कहीं। कभी धूप में तपता निःशब्द द्वार, कभी बारिशों में भीगता प्यार। कभी मंज़िल पास लगे, पर न हो, कभी खो जाएँ रास्ते, फिर भी बहो। हर मोड़ सिखाता है कुछ नया, हर ठोकर बन जाती है अनुभव का काया। चाहे मिले अंधेरे, चाहे उजाले, मन में हो दीप, तो डर किसके हवाले? थोड़ी रुकावट, थोड़ी उड़ान, इन्हीं से बनती है जीने की जान। जो थक जाए, वो बैठ ले ज़रा, पर हार नहीं, ये विश्राम की कला। चलते रहो, चाहे धीमे सही, क्योंकि राहें रुकने वालों की नहीं। जीवन की राह है खुद एक गीत, कभी करुण, कभी मधुर संगीत। तू बस चलता चल विश्वास लिए, हर मोड़ पे तेरा सूरज खिले।

आज की नारी

Image
आज की नारी  — स्वर की एक नई रागिनी वो नारी है, परिभाषा नई, संवेदन में तेज़, विचारों में ठनी। ना सीमाओं की कै़दी अब, वो उड़ान है खुली गगन-सी सधी। समझ की ज्योति से रोशन है, हर मोड़ पे खुद की पहरेदार है। सही-गलत की थाह रखे, वो आत्मा की पुकार है। ना चाह उसे अब सहारा किसी का, ना कोई मोहर लगे रिश्तों की वज़ा का। उसे साथी चाहिए, साया नहीं, जहाँ इज़्ज़त मिले, माया नहीं। न वो निर्भरता की बात करे, ना झूठे वादों से दिल बहलाए। वो साथी चाहे — संगदिल, जो मुस्कानों संग आँसू भी अपनाए। जो थामे हाथ, पर बाँधे नहीं, जो बोले साथ, पर आँखे नीची न करे कहीं। जो उसके गिरने में झुके नहीं, बल्कि थामे, और फिर से उठने की वजह बने वहीं। आज की नारी — स्वाभिमान की दीपिका, ना कोरी कल्पना, ना परछाईं किसी इतिहास की। वो चाहती है प्रेम, मगर बंधन नहीं, चाहती है साथ, मगर समर्पण में क्षय नहीं। वो नारी है — प्रेरणा, प्रकाश, संघर्षों की मृदु मधुर आवाज़। हर रिश्ते में बराबरी की बात करे, वो सिर्फ़ जिए नहीं — संपूर्णता से साथ करे। यही है आज की नारी की परिभाषा, नम्र भी है, पर अडिग उसकी भाषा। न साथ उसक...